Interview with Ketan Yadav, Author of Charwahe ka Geet
Poet Ketan reflects on Charwahe Ka Geet, discussing shepherd culture, memory, nature, technology, poetry, and the role of literature in preserving human sensitivity in a rapidly changing world.on Jul 23, 2026
फ्रंटलिस्ट: हमारे जुलाई अंक की थीम "The Inner Life of Stories" है। एक चरवाहे का गीत लिखते समय क्या यह आपके लिए केवल कविता-लेखन था या अपने भीतर की किसी खोती हुई दुनिया से संवाद करने की प्रक्रिया भी?
केतन - जैसे हम भीतर की अकुलाहट से परेशान होकर बाहर उससे मुक्ति का रास्ता खोजते हैं वैसे ही बाहर के चोटों से, टूटन से, आघातों से व्याकुल होकर हम अपने भीतर लौटते। अपने जीवन के उन हिस्सों में जहाँ हमें सचमुच का हमारा जीवन मिलता। बनने-बिगड़ने की प्रक्रिया एक साथ चलती है। मनुष्य ने बहुत तकनीक बहुत कौशल और ज्ञान सीखा किंतु प्रकृति को बचा पाने में उसकी कुशलता आज आदिम समय से अबतक सर्वाधिक पराजित हुई। हम जितना कुछ बना नहीं रहे उससे अधिक नष्ट कर रहे हैं। यह केवल एक चरवाहा संस्कृति की ओर लौटना नहीं था बल्कि उस जीवन शैली की ओर लौटना था जहाँ हम प्रकृति के साहचर्य के साथ जीवन जीते। जहाँ हम प्रकृति से उतना ही लेते जितना में जीवनयापन हो जाए, अधिक नहीं। हम जीना भूल रहे हैं। लगातार नैनों सेकैंडों में हम बँटते जा रहे। सेकैंडों में स्क्रोल होते रीलमय ( या रील वाली ) दुनिया में चरवाहों के पास जाना यानी साँझ में चारागाह से लौटते धीमे चाल चलते पशुओं के जीवन तक लौटना है। जीवन ठहर कर ही जिया जा सकता है। जो जल्दी में बीत रहा वह तो बिताया जा रहा, काटा जा रहा। इन सबके बहाने एक कवि इस संसार के बरक्स प्रतिरोध में अपना एक वैकल्पिक संसार रचता है।
बिल्कुल यह खोती हुई दुनिया के बीच जीवन को बचा लेने , संजो लेने की बेचैनी है।
फ्रंटलिस्ट: आपकी कविताओं में चरवाहा केवल एक पात्र नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक जीवन-दृष्टि का प्रतीक बनकर उभरता है। इस चरवाहे की दुनिया आपको आज के समय के बारे में क्या सोचने पर मजबूर करती है?
केतन - इस किताब पर कई अच्छे आलोचनात्म लेख आ चुके हैं। मसलन आलोचना और नया पथ वेबसाइट्स पर भी जिसमें एक पाठक के रूप में भी लोगों ने उसे अनुभव किया और उन जगहों तक गये जहाँ कवि चुप रहना चाहता है। यहाँ मैं जो कुछ बोल रहा वह बस महसूस किया हुआ जीवन ही बता रहा। अपनी कविता के विषय में अतिरिक्त मैं क्या बोलूँ ? वह मेरे सहृदय पाठकों का काम है। इस दौड़ती-भागती दुनिया में जहाँ सब इंसान नहीं मशीन बन चुके हैं और मशीन बन जाने के लिए ही पढ़ रहे , तैयारी कर रहे वहाँ लेखक या कलाकार ही वह जीवन रचना चाहता है जो सचमुच जीवन है। चरवाहों की संस्कृति ही आदिम मनुष्य की संस्कृति है।
कविता की एक पंक्ति आती है ‘ ख़ानाबदोश था मेरा आदिम चरवाहा वह घर नहीं चारागाह बदलता था / उसके लिए उसकी भूख और उसके पशुओं की भूख एक हुआ करती थी। ' आज भी आप पशु संस्कृति से जूड़े हुए लोगों तक पहुँचेंगे तो पाएंगे कि मवेशी उनके लिए परिवार के सदस्य होते हैं। ऐसा लगेगा कि भूख लगने पर पशु बात कर रहे चरवाहे के साथ। आधुनिक व्यवसाय पद्धति चरवाहा संस्कृति के महत्व को नष्ट नहीं कर सकती। उसमें जीवनबोध है और वह सस्टिनेबल डेवलपमेंट का रास्ता भी जो पूँजीवादी उपभोक्ता संस्कृति में मुमकिन नहीं। दुनिया को चरवाहे की निगाह से देखने का मतलब एक अबोध मवेशी की निगाह से भी देखना है। इस मानव समाज के वे हिस्से जो इसी समाज का अंग हैं। दोहन की उपभोक्ता बाजारवादी संस्कृति के इतर सजीव संवेदना की दृष्टि से देखने की प्रस्तावना है।
फ्रंटलिस्ट: पुस्तक में बार-बार स्मृति और प्रकृति की ओर लौटने की आकांक्षा दिखाई देती है। क्या यह लौटना अतीत के प्रति मोह है या वर्तमान की संवेदनहीनता के बीच अर्थ की तलाश?
केतन - इस दुनियाँ में संस्कृति निर्माण की शुरुआत चरवाहों ने ही किया। कृषि के विकास के पहले न संग्राहण की जरूरत थी और न ही प्रतिस्पर्धा। इस बात की तस्दीक युवाल नोवा हरारी ने भी किया कि कृषि ने मानव संस्कृति को बदल दिया और उसे वे गुलामी से भी जोड़ते हैं। कृषि से पहले मनुष्य चरवाहों की तरह अपने पशुओं के साथ भटकते थे। वे संग्रह नहीं करते थे। कृषि ने उन्हें संग्रह करने पर विवश किया और पशुओं और मनुष्यों को भी एक क्षेत्र तक बाँध दिया। चरवाहे भटकते थे और इसलिए उनके पास दुनियाभर की जानकारी थी। संख्या की खोज चरवाहों ने ही की। वे अपने हर पशु की पहचान रखते थे। संग्रह में एक कविता की पंक्ति है ‘ एक पशु के खो जाने का दुख पूरे पशुओं के खो जाने सा होता है ' अतः संख्या की शुरुआत दुनिया के आदिम चरवाहों ने ही की । गणना की आवश्यकता वहीं से जन्मी। जंगल में भटकते हुए तमाम पेड़ों की पत्तियां, पौधें, घास खाकर पशुओं मवेशियों ने ही चरवाहों को बताया कि कौन सी औसधि उनके काम की है और कौन खाने योग्य नहीं। कुछ विषाक्त खाकर जब मवेशी बिमार पड़ते तो चरवाहों ने ही उनके उपचार के लिए स्वास्थ्यवर्धक जड़ी बूटी खोजा। वे नदियों से पानी पीते , पेड़ों से ताज़े फल खाते। मवेशियों से उन्हें दूध, ऊन भी प्राप्त हो जाता। और सीमित संसाधनों और आवश्यकताओं के साथ दुनिया चल रही थी। आज भी हम विशुद्ध चरवाहा समुदाय को देखेंगे जो पहाड़ियों पर या शहर से कोसों दूर रहते तो हम उनके आजके जीवन में भी उनके घुमन्तू पुरखों की संस्कृति देख पाएंगे।
इनके जीवन की ओर लौटना वास्तव में जीवनबोध की ओर लौटना है। इस पृथ्वी के भविष्य के बारे में सोचना है और खत्म होती हुई इस दुनिया के बरक्स एक वैकल्पिक सुंदर दुनिया जो वास्तव में पहले कभी थी उसको बचाने की काव्यात्मक कोशिश है या यूं कहें कि इस बहाने मैं भी अपने बचपन और अपनी जड़ों की ओर ही लौटा।
फ्रंटलिस्ट: आपकी कविताएँ मनुष्य, प्रकृति और मशीन के बीच बदलते रिश्तों को गहरी संवेदनशीलता से देखती हैं। क्या आपको लगता है कि तकनीक के विस्तार ने हमारे भावनात्मक जीवन को भी प्रभावित किया है?
केतन - हाँ , तकनीक या प्रौद्योगिकी के बाद का मनुष्य और जीवन
मेरी रचना और मेरे अवचेतन में जरूर बसा हुआ है। हम बचपन से बड़े सोशल मीडिया के युग में हुआ। सोशल मीडिया के तमाम प्लैटफॉर्म का बनना और लाँच होना इसकी हमारी पीढ़ी पहली गवाह है। और यह मनुष्य के जीवन में आमूलचूल नहीं बल्कि अप्रत्याशित परिवर्तन कर रहा था जिसकी पहले की गति हजारों सालों में थी। तकनीक के आने से मनुष्य की परिपक्वता, प्रेम, विचारशीलता, अनुभवबोध, क्षमता सबपर अभूतपूर्व प्रभाव पड़ा है।
ज़ाहिर है कि हमारे समय की रचना में यह बदलाव गहरे रूप में होने ही चाहिए। मेरी कई कविताओं में यह किसी न किसी रूप में दर्ज़ होता है। संग्रह के ब्लर्ब पर प्रकाशन ने इस संबंध में भी एक कविता उद्धृत की है जिसका शीर्षक है ‘ मैं तुम्हारा स्पर्श भूल रहा हूँ ' इस कविता में वह बात बहुत खुले रूप में भी आई है और पहले के और अबके समय को सांस्कृतिक रूप से अलग कर देती है। जिसे हम भावना या संवेदनशीलता कहते हैं वह हमें स्तब्ध करती है, रोक देती है, ठहरकर महसूस करने के लिए विवश करती है लेकिन तकनीक के इस युग में ठहरना पिछड़ना है। ऐसे में वह मनुष्य कहाँ संवेदना को महसूस कर रहा है? वह निरंतर मशीन बनता जा रहा। मुक्तिबोध ने ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान की बात कही थी। इस टर्म का मतलब है कि कोई भी ज्ञान संवेदना के बिना खतरनाक है और कोई भी संवेदना ज्ञान के बिना। तकनीकी युग में हम निरंतर ज्ञान की ओर बढ़ रहे लेकिन वह ज्ञान संवेदना विहीन होता जा रहा। ऐसे में पुनर्सृजन और ज्ञान एवं संवेदना को पास रखने का दायित्व कला का ही है। तकनीक के युग के मनोरंजन के साधन भी निरंतर कुछ अर्थों में सुविधाजनक हो रहे तो कुछ अर्थों में क्षय कर रहे।
ऐसी चीजें कितनी उत्तेजना पैदा कर रहीं और कितनी संवेदना इसपर बात होनी चाहिए। समाज के स्तर पर संवेदनशील लोगों का बचा रहना बहुत जरूरी है।
फ्रंटलिस्ट: इन कविताओं में एक सूक्ष्म उदासी और बेचैनी मौजूद है, लेकिन साथ ही प्रेम और उम्मीद की झलक भी मिलती है। आपके लिए कविता निराशा का दस्तावेज़ है या उम्मीद का प्रतिरोध?
केतन - दोनों ही हैं। बल्कि उम्मीद का प्रतिरोध की जगह प्रतिरोध का उम्मीद कहना चाहूँगा। कोई भी रचना भीतर के संघर्षों से उपजती है और एक बड़ी कविता में या कहें की एक जरूरी कविता में समय की निराशा हतासा भी दर्ज होगी उसके साथ ही प्रतिरोध और उम्मीद भी। कविता युद्ध का वर्णन नहीं है वह युद्ध में मारे गये निरपराध जनजीवन की करुणगाथा है। कविता एक तरफ बहुत शक्तिशाली है तो दूसरी तरफ बहुत लाचार। उसे बड़े जीवन संघर्षों और सामुहिक हितों के लिए लड़ते समय पराजित होने वाले असहायों के साथ ही खड़ा होना होगा। कविता वर्चस्ववाद के समक्ष हाशिए के लोगों के साथ खड़ी होगी। प्रेम को भी मैं बड़ी सामाजिक सांस्कृतिक परिघटना के रूप में देखता हूँ। सचमुच में प्रेम करने वाला व्यक्ति जाति, धर्म , क्षेत्र , भाषा आदि सब वर्जनाओं को तोड़कर प्रेम करेगा। इसलिए यह भी कह सकते हैं कि वास्तव में प्रेम कृत्रिम विभेदों और वर्जनाओं के विरुद्ध खड़ा होता है। इसलिए मुझे प्यार पर भरोसा है। वास्तव में नफ़रत केवल नष्ट करती है और प्रेम ही सृजन का काम कर सकती। लेकिन मैंने कविता में एक जगह लिखा है कि प्रेम से प्रेम करने के लिए हमें घृणा से घृणा करना होगा। दुनिया में सबसे अच्छी कविताएं सबसे मुश्किल दौर में लिखी गई हैं।
इस समय भी यही होगा और आगे भी।
फ्रंटलिस्ट: जब चारागाह, पेड़, पशु और लोक-स्मृतियाँ लगातार हमारे जीवन से गायब हो रही हैं, तब कविता उन्हें बचाने या पुनः जीवित करने में क्या भूमिका निभा सकती है?
केतन - कविता सबकुछ घटित होता हुआ देखती है। सबकुछ कविता के ऊपर बीतता है। वह सबका गवाह बनती है। बल्कि जो कुछ इतिहास, दर्शन , समाजशास्त्र, मनोविज्ञान और अन्य कई कलाओं में दर्ज़ नहीं हो सका कविता बहुत चुपचाप सब महसूस करती है। कविता इस भीषण कोलाहल के बीच एक अनकही चुप्पी है। जबतक मनुष्य रहेगा कविता तबतक रहेगी। कविता कुछ बचा नहीं पाएगी पर बेबस होकर सबकुछ अपने भीतर तरल-सघन रूप में रखेगी जरूर। कविता मनुष्य के पास नहीं जाएगी मनुष्य को कविता के पास जाना होगा। कविता से हम बदलाव की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। क्रूर एवं हिंसक व्यक्ति कविता के पास जाकर संवेदनशील नहीं हो सकता अगर वह हृदयहीन होकर जाएगा। कविता के पास संवेदनशील लोग ही पहुँच सकते। कविता के पास विजय के अनुभव नहीं मिलेंगे पर तमाम पश्चाताप जो कहीं न कहा जा सकेगा वह मिल सकता है। ‘दुनिया बनने के क्रम में ’ ( कविता का एक शीर्षक ) चरवाहों ने जो गीत या कविताएं कहीं वो कुछ बचाने के लिए नहीं कहा कविता बचने की चिंता से बेफिक्र होती है हां उसमें नष्ट होने का दुख जरूर होता है। चरवाहे तो बस वृक्षों, जंगलों, नदियों, पहाड़ों और अपने प्यारे मवेशियों से बात करने के लिए गीत गाए। कविता की भूमिका एक अतृप्त बेचैनी, एक अनकहा दुख , अमिट टीस, अनबुझा पश्चाप, अदृश्य हताशा, सूखे हुए आँसू , अबोली चुप्पी, कभी न बाँटा जा सकने वाला अकेलापन और एक शास्वत विछोह को अपने कलेजे में पालने जितनी होगी।
फ्रंटलिस्ट: आपकी कविताएँ पाठक को बाहरी दुनिया के साथ-साथ अपने भीतर झाँकने के लिए भी प्रेरित करती हैं। लेखन की प्रक्रिया में आपने अपने बारे में कौन-सी नई बात खोजी?
केतन - रचना प्रक्रिया सचमुच पृथ्वी पर कुछ जन्म लेनी की प्रक्रिया सी ही है। रचना प्रक्रिया पर भी मेरी एक कविता है संग्रह में ‘ कवि नहीं होना चाहता हूँ ' शीर्षक से। मेरे हिसाब से कविता एक बार में नहीं घटित होती। मतलब मैं जब कविता लिख रहा होता हूँ उसके पहले वह कितने बार मेरे मन में घटित हो चुकी होती है। मैं उस अमूर्त अनकही भावना का पीछा करता उसे शब्द देने की कोशिश करता। कई बार वह बात मन में आकर चली जाती फिर अगली बार कोई वैसी या उससे अधिक सघन रूप में वह परिस्थिति बनती है तो पुनः उस भावना से तारतम्य कर पाता खुदको और रचना प्रक्रिया आगे बढ़ती। लेखन की प्रक्रिया भी खुदसे जूझने की प्रक्रिया है। मेरे साथ कुछ ऐसी चीजें हैं लिखते वक्त की जो हरबार प्रायः लागू होती हैं मुझपर मसलन मैं बहुत भरपेट खाना खाकर नहीं लिख सकता... कई बार एक मनःस्थिति मूड या जोन में बने रहने के लिए उस भावना या विचार से जूझते हुए घंटों मैं बिना खाए पिए चुपचाप बंद कमरे में पड़ा रहता। बहुत आरामदायक बिस्तर, पंखे और तड़क भड़क रौशनी के बीच मैं नहीं लिख पाता। दृश्य के बीच नहीं लिख पाता मैं उससे दूर होकर ही लिखता। जूझने और जो मन में अँटकी हुई बात भीतर भीतर कुरेदती है उसको भाषा में दर्ज़ करने की बेचैनी से कवि लड़ता है। इस प्रक्रिया में सबसे पहले तमाम कवियों से गुजरता या कलाओं से लेखों से ही। अगर मुझे लगता है मेरे उस टीस का विरेचन हो जा रहा था मेरी बात कहीं कही जा चुकी है तो मैं हल्का महसूस करता हूँ और उसपर लिखने की बात स्थगित कर देता। जबतक उस भावना या विचार का कुछ अनकहा हिस्सा मेरे तक इकट्ठा न होता। मेरे लेखन ने मुझे लगातार और अधिक संवेदनशील और कोमल बनाया है। कई बार तो खुद को नष्ट कर देने की हद तक। मैं बहुत बैलेंस्ड जीवन नहीं जी पाता। मैं अतिवादी हूँ । इन अर्थों में कि मैं किसी चीज से जल्दी उबर नहीं पाता। यह सोचना मेरे लिए बहुत ख़तरनाक है कि अगर मैं कविताएं नहीं लिखता तो क्या करता । मैं अपनी सबसे ज्यादा बात तो कविता से ही करता हूं।वह नहीं होती तो अनुभूति के सघनता के उन स्तरों तक कौन पहुँचता जीवन में भला। मेरे लिए कविता एक संसार है जैसा मैं इस वस्तुजगत को होते देखना चाहता हूँ वह आदर्शवादी नहीं है लेकिन समता और सामाजिक न्याय पूर्ण तो है। कविता ने मुझे जीवन का विकल्प दिया है और मेरी कविता ही सचमुच मेरा विकल्प हो सकती है।
फ्रंटलिस्ट: यदि एक चरवाहे का गीत पढ़ने के बाद पाठक अपने जीवन की रफ्तार, प्रकृति से अपने संबंध या अपनी संवेदनाओं पर एक बार ठहरकर विचार करे, तो आप चाहेंगे कि वह सबसे महत्वपूर्ण सवाल कौन-सा हो?
केतन- ... यही कि अब वह अपने संवेदना की दुनिया में कब लौट रहा और कौन सी कविता कौन सी पंक्ति उसके भीतर धँसी रह गई...
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